गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

त्याग का अर्थ है: पकड़ छोड़ दो


यह सूत्र यह कहता है, इतना ही कहता है, सीधी-सीधी बात कि जो छोड़ता है वह भोगता है। यह यह नहीं कहता कि तुम्हें भोगना हो तो तुम छोड़ना। यह यह कहता है कि अगर तुम छोड़ सके, तो तुम भोग सकोगे। लेकिन तुम भोगने का खयाल अगर रखे, तो तुम छोड़ ही नहीं सकोगे।

अदभुत है सूत्र। पहले कहा, सब परमात्मा का है। उसमें ही छोड़ना गया। जिसने जाना, सब परमात्मा का है, फिर पकड़ने को क्या रहा? पकड़ने को कुछ भी बचा। छूट गया। और जिसने जाना कि सब परमात्मा का है और जिसका सब छूट गया और जिसका मैं गिर गया, वह परमात्मा हो गया। और जो परमात्मा हो गया, वह भोगने लगा, वह रसलीन होने लगा, वह आनंद में डूबने लगा। उसको पल-पल रस का बोध होने लगा। उसके प्राण का रोआं-रोआं नाचने लगा। जो परमात्मा हो गया, उसको भोगने को क्या बचा? सब भोगने लगा वह। आकाश उसका भोग्य हो गया। फूल खिले तो उसने भोगे। सूरज निकला तो उसने भोगा। रात तारे आए तो उसने भोगे। कोई मुस्कुराया तो उसने भोगा। सब तरफ उसके लिए भोग फैल गया। कुछ नहीं है उसका अब, लेकिन चारों तरफ भोग का विस्तार है। वह चारों तरफ से रस को पीने लगा।

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आदमी बहुत सी बातें जानकर भुलाए हुए है


आदमी बहुत सी बातें जानकर भुलाए हुए है। कुछ बातों को वह स्मरण ही नहीं करता। क्योंकि वह स्मरण उसके अहंकार की सारी की सारी अकड़ खींच लेगा, बाहर कर देगा। फिर क्या है हमारा? छोड़ें जन्म और मृत्यु को। जीवन में ऐसा भ्रम होता है कि बहुत कुछ हमारा है। लेकिन जितना ही खोजने जाते हैं, पाया जाता है कि नहीं वह भी हमारा नहीं है।

आप कहते हैं, किसी से मेरा प्रेम हो गया, बिना यह सोचे हुए कि प्रेम आपका निर्णय है, योर डिसीजन? नहीं, लेकिन प्रेमी कहते हैं कि हमें पता ही नहीं चला, कब हो गया! इट हैपेन्ड, हो गया, हमने किया नहीं। तो जो हो गया, वह हमारा कैसे हो सकता है? नहीं होता तो नहीं होता। हो गया तो हो गया। बड़े परवश हैं, बड़ी नियति है। सब जैसे कहीं बंधा है।

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सारी क्रांतियां हुई, शिक्षा में क्रांति नहीं हुई


दुनिया में अब तक धार्मिक क्रांतियां हुई हैं। एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोग हो गए। कभी समझाने-बुझाने से हुए, कभी तलवार छाती पर रखने से हो गए लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। हिंदू मुसलमान हो जाए तो वैसे का वैसा आदमी रहता है, मुसलमान ईसाई हो जाए तो वैसा का वैसा आदमी रहता है, कोई फर्क नहीं पड़ा धार्मिक क्रांतियों से।

राजनैतिक क्रांतियां हुई हैं। एक सत्ताधारी बदल गया, दूसरा बैठ गया। कोई जरा दूर की जमीन पर रहता है, वह बदल गया, तो जो पास की जमीन पर रहता है, वह बैठ गया। किसी की चमड़ी गोरी थी वह हट गया तो किसी की चमड़ी काली थी वह बैठ गया, लेकिन भीतर का सत्ताधारी वही का वही है।

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किसी और जैसे बनने की कोशिश किस लिए?


मनुष्य के साथ यह दुर्भाग्य हुआ है। यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है, अभिशाप है जो मनुष्य के साथ हुआ है कि हर आदमी किसी और जैसा होना चाह रहा है और कौन सिखा रहा है यह? यह षडयंत्र कौन कर रहा है? यह हजार-हजार साल से शिक्षा कर रही है। वह कह रही राम जैसे बनो, बुद्ध जैसे बनो। या अगर पुरानी तस्वीरें जरा फीकी पड़ गईं, तो गांधी जैसे बनो, विनोबा जैसे बनो। किसी किसी जैसे बनो लेकिन अपने जैसा बनने की भूल कभी मत करना, किसी जैसे बनना, किसी दूसरे जैसे बनो क्योंकि तुम तो बेकार पैदा हुए हो। असल में तो गांधी मतलब से पैदा हुए। तुम्हारा तो बिलकुल बेकार है, भगवान ने भूल की जो आपको पैदा किया। क्योंकि अगर भगवान समझदार होता तो राम और गांधी और बुद्ध ऐसे कोई दस पंद्रह आदमी के टाइप पैदा कर देता दुनिया में। या अगरबहुत ही समझदार होता, जैसा कि सभी धर्मों के लोग बहुत समझदार हैं, तो फिर एक ही तरह के "टाइप' पैदा कर देता। फिर क्या होता?

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जिसे आप ध्यान कह रहे हैं, उसमें और आटो-हिप्नोसिस में, आत्म-सम्मोहन में क्या फर्क है


वही फर्क है, जो नींद में और ध्यान में है। इस बात को भी समझ लेना उचित है। नींद है प्राकृतिक रूप से आई हुई, और आत्म-सम्मोहन भी निद्रा है प्रयत्न से लाई हुई। इतना ही फर्क है। हिप्नोसिस में-हिप्नोस का मतलब भी नींद होता है-हिप्नोसिस का मतलब ही होता है तंद्रा, उसका मतलब होता है सम्मोहन। एक तो ऐसी नींद है जो अपने आप आ जाती है, और एक ऐसी नींद है जो कल्टीवेट करनी पड़ती है, लानी पड़ती है।

अगर किसी को नींद न आती हो, तो फिर उसको लाने के लिए कुछ करना पड़ेगा। तब एक आदमी अगर लेटकर यह सोचे कि नींद आ रही है, नींद आ रही है, नींद आ रही है...मैं सो रहा हूं, मैं सो रहा हूं, मैं सो रहा हूं...तो यह भाव उसके प्राणों में घूम जाए, घूम जाए, घूम जाए, उसका मन पकड़ ले कि मैं सो रहा हूं, नींद आ रही है, तो शरीर उसी तरह का व्यवहार करना शुरू कर देगा। क्योंकि शरीर कहेगा कि नींद आ रही है तो अब शिथिल हो जाओ। नींद आ रही है तो श्वासें कहेंगी कि अब शिथिल हो जाओ। नींद आ रही है तो मन कहेगा कि अब चुप हो जाओ। नींद आ रही है, इसका वातावरण पैदा अगर कर दिया जाए भीतर, तो शरीर उसी तरह व्यवहार करने लगेगा। शरीर को इससे कोई मतलब नहीं है। शरीर तो बहुत आज्ञाकारी है।

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सब कुछ है



ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।1।।

जगत में जो कुछ स्थावर-जंगम संसार है, वह सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है। उसके त्याग-भाव से तू अपना पालन कर; किसी के धन की इच्छा कर।।1।।

ईशावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा: सब कुछ परमात्मा का है। इसीलिए ईशावास्य नाम है : ईश्वर का है सब कुछ।

मन करता है मानने का कि हमारा है। पूरे जीवन इसी भ्राँति में हम जीते हैं। कुछ हमारा है-मालकियत, स्वामित्व-मेरा है। ईश्वर का है सब कुछ, तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती

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बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

पश्चिम अब झेन के लिए पूरा तैयार है


डी. टी. सुजूकी पश्चिम में, अस्तित्व के प्रति एक नए दृष्टिकोण के साथ आया। उसने बुद्धिजीवियों को आकर्षित किया क्योंकि वह बहुत विद्वान था, गहरी विद्वत्ता थी उसके पास, और उसने पश्चिम के मन को धर्म की एक पूरी नई तरह की अवधारणा दी। लेकिन यह केवल अवधारणा तक सीमित रही, यह केवल मन के तर्क तक ही सीमित रही, इससे अधिक गहराई में वह कभी प्रविष्ट नहीं हुई।

इसी के समानांतर स्थिति चीन में भी थी। चीन में बोधिधर्म के जाने से पूर्व ही, चीन बौद्ध धर्म को स्वीकर कर चुका था। बोधिधर्म वहां चौदह वर्ष पूर्व गया, जब कि बुद्ध का धर्म और दर्शन, बोधिधर्म के चीन पहुंचने के : सौ वर्षों पूर्व ही, अर्थात दो हजार वर्ष पूर्व ही चीन पहुंच गया था। इन : सौ वर्षों में बौद्ध धर्म के विद्वानों ने पूरे चीन को बौद्ध धर्म में रूपांतरित कर दिया था।

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पश्चिम के बुद्धिजीवी झेन की ओर आकर्षित क्यों हुए?


लोग अपने अंदर विराट रिक्तता का अनुभव कर रहे हैं और वे उस रिक्तता को भरना चाहते हैं। तुम रिक्तता के साथ जी नहीं सकते। रिक्तता खालीपन है और इस खालीपन से जीवन उदास और गंभीर हो जाता है।

सभी धर्म तुम्हारी इस रिक्तता को असत्यों से भरते आए हैं। अब इन झूठों का भंडाफोड हो गया है। विज्ञान ने इन झूठों का भंडाफोड करने कि लिए बहुत कुछ किया है और इसके ही साथ महान ध्यानियों और रहस्यदर्शियों ने भी धर्म के इन असत्यों को उधारने में पूरे विश्वभर में अत्यधिक कार्य किया है।

समकालीन मनुष्य एक बडी अजीब स्थिति में खडा है, पुराना गिर चुका है, जो एक धोखा, एक भ्रम था, और नया अभी तक आया नहीं है। इसलिए एक अंतराल है, एक अल्प अवकाश जैसा है और पश्चिम का बुद्धिजीवी कुछ ऐसी चीज खोजने का प्रयास कर रहा है, जो फिर से एक असत्य नहीं होगा, जो तुम्हें केवल सांत्वना नहीं देगा, बल्कि तुम्हें रूपांतरित करेगा, और जो तुम्हारे अंतरतम में एक गहरी क्रांति बनेगा

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प्रत्येक अंश पूर्ण है


यह बड़े मजे का सूत्र है। इस सूत्र में न मालूम कितनी बातें कही गई हैं। इस सूत्र में यह कहा गया है कि वह पूर्ण आ जाता है निकलकर पूरा का पूरा। ध्यान रहे, पीछे पूरा रह जाता है, यह तो कहा ही है, साथ में यह भी कहा है कि वह पूरा का पूरा बाहर आ जाता है। इसका क्या मतलब हुआ? इसका यह मतलब हुआ कि एक-एक व्यक्ति भी पूरा का पूरा परमात्मा है। एक-एक व्यक्ति भी, एक-एक अणु भी पूरा का पूरा परमात्मा है। ऐसा नहीं कि अणु आंशिक परमात्मा है-पूरा का पूरा।

थोड़ा कठिन है, क्योंकि हमारे गणित के लिए अपरिचित है। अगर यह समझ में आया कि पूर्ण से पूर्ण निकल आता है और पीछे पूर्ण रह जाता है, तो मैं और एक बात कहता हूं कि पूर्ण से अनंत पूर्ण निकल आते हैं, तो भी पीछे पूर्ण रह जाता है। एक पूर्ण निकलकर अगर दूसरा पूर्ण न निकल सके, तो उसका मतलब हुआ कि एक के निकलने के बाद पीछे कुछ कम हो गया है। एक पूर्ण के बाद दूसरा पूर्ण निकले, तीसरा पूर्ण निकले और पूर्ण निकलते चले जाएं और पीछे सदा ही पूर्ण निकलने की उतनी ही क्षमता बनी रहे, तभी पीछे पूर्ण शेष रहा। इसलिए ऐसा नहीं है कि आप परमात्मा के एक हिस्से हैं। जो ऐसा कहता है, वह गलत कहता है। जो ऐसा कहता है कि आप एक अंश हैं परमात्मा के, वह गलत कहता है। वह फिर लोअर मैथमेटिक्स की बात कर रहा है। वह वही दुनिया की बात कर रहा है जहां दो और दो चार होते हैं। वह नापी-जोखी जाने वाली दुनिया की बात कर रहा है। मैं आपसे कहता हूं और उपनिषद आपसे यह कहते हैं, और जिन्होंने भी कभी जाना है वह यही कहते हैं कि तुम पूरे के पूरे परमात्मा हो।

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - अंतिम भाग


मोहम्मद ने कहा कि तू उठा सकता था पहला पैर भी, दायां भी उठा सकता था, कोई मजबूरी न थी। लेकिन अब चूंकि तू बायां उठा चुका इसलिए अब दायां उठाने में असमर्थता हो गई। आदमी की सीमाएं हैं। सीमाओं के भीतर स्वतंत्रता है। स्वतंत्रता सीमाओं के बाहर नहीं है। तो बहुत पुराना संघर्ष है आदमी के चिंतन का कि अगर आदमी पूरी तरह परतंत्र है, जैसा ज्योतिषी साधारणतः कहते हुए मालूम पड़ते हैं। साधारण ज्योतिषी कहते हुए मालूम पड़ते हैं कि सब सुनिश्चित है, जो विधि ने लिखा है वह होकर रहेगा। तो फिर सारा धर्म व्यर्थ हो जाता है। और या फिर जैसा कि तथाकथित तर्कवादी, बुद्धिवादी कहते हैं कि सब स्वच्छंद है, कुछ बंधा हुआ नहीं है, कुछ होने का निश्चित नहीं है, सब अनिश्चित है। तो॥

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दो व्यक्तियोँ की तुलना न करेँ


जब तक दुनिया में हम एक आदमी को दूसरे आदमी से कम्पेयर करेंगे, तुलना करेंगे तब तक हम एक गलत रास्ते पर चले जाएंगे। वह गलत रास्ता यह होगा कि हम हर आदमी में दूसरे आदमी जैसा बनने की इच्छा पैदा करते हैं; जब कि कोई आदमी किसी दूसरे जैसा न बना है और न बन सकता है।

राम को मरे कितने दिन हो गए, या क्राइस्ट को मरे कितने दिन हो गए? दूसरा क्राइस्ट क्यों नहीं बन पाता और हजारों-हजारों क्रिश्चिएन कोशिश में तो चौबीस घंटे लगे हैं कि क्राइस्ट बन जाएं। और हजारों हिंदु राम बनने की कोशिश में हैं, हजारों जैन, बुद्ध, महावीर बनने की कोशिश में लगे हैं, बनते क्यों नहीं एकाध? एकाध दूसरा क्राइस्ट और दूसरा महावीर पैदा क्यों नहीं होता? क्या इससे आंख नहीं खुल सकती आपकी? मैं रामलीला के रामों की बात नहीं कह रहा हूं, जो रामलीला में बनते हैं राम। न आप समझ लें कि उनकी चर्चा कर रहा हूं, कई लोग राम बन जाते हैं। वैसे तो कई लोग बन जाते हैं, कई लोग बुद्ध जैसे कपड़े लपेट लेते हैं और बुद्ध बन जाते हैं। कोई महावीर जैसा कपड़ा लपेट लेता है या नंगा हो जाता है और महावीर बन जाता है। उनकी बात नहीं कर रहा। वे सब रामलीला के राम हैं, उनको छोड़ दें। लेकिन राम कोई दूसरा पैदा होता है?

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 9


महावीर से गोशालक के नाराज हो जाने के कुछ कारणों में एक कारण यह पौधा भी था--महावीर को छोड़ कर चले जाने में। ज्योतिष का--जिस ज्योतिष की मैं बात कर रहा हूं--उसका संबंध अनिवार्य से, एसेंशियल से, फाउंडेशनल से है। आपकी उत्सुकता ज्यादा से ज्यादा सेमी एसेंशियल तक जाती है। पता लगाना चाहते हैं कि कितने दिन जीऊंगा? मर तो नहीं जाऊंगा? जीकर क्या करूंगा, जी ही लूंगा तो क्या करूंगा, इस तक आपकी उत्सुकता ही नहीं पहुंचती। मरूंगा तो मरते में क्या करूंगा, इस तक आपकी उत्सुकता नहीं पहुंचती। घटनाओं तक पहुंचती है, आत्माओं तक नहीं पहुंचती। जब मैं जी रहा हूं, तो यह तो घटना है सिर्फ। जीकर मैं क्या कर रहा हूं, जीकर मैं क्या हूं, वह मेरी आत्मा है!

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 8


महाभारत अमरीका की चर्चा करता है। अर्जुन की एक पत्नी मेक्सिको की लड़की है। मेक्सिको में जो मंदिर हैं वे हिंदू मंदिर हैं, जिन पर गणेश की मूर्ति तक खुदी हुई है।
बहुत बार सत्य खोज लिए जाते हैं, खो जाते हैं। बहुत बार हमें सत्य पकड़ में आ जाता है, फिर खो जाता है। ज्योतिष उन बड़े से बड़े सत्यों में से एक है जो पूरा का पूरा खयाल में आ चुका और खो गया। उसे फिर से खयाल में लाने के लिए बड़ी कठिनाई है। इसलिए मैं बहुत सी दिशाओं से आपसे बात कर रहा हूं। क्योंकि ज्योतिष पर सीधी बात करने का अर्थ होता है कि वह जो सड़क पर ज्योतिषी बैठा है, शायद मैं उसके संबंध में कुछ कह रहा हूं। जिसको आप चार आने देकर और अपना भविष्य-फल निकलवा आते हैं, शायद उसके संबंध में या उसके समर्थन में कुछ कह रहा हूं।
नहीं, ज्योतिष के नाम पर सौ में से निन्यानबे धोखाधड़ी है। और वह जो सौवां आदमी है, निन्यानबे को छोड़ कर उसे समझना बहुत मुश्किल है। क्योंकि वह कभी इतना डागमेटिक नहीं हो सकता कि कह दे कि ऐसा होगा ही। क्योंकि वह जानता है कि ज्योतिष बहुत बड़ी घटना है। इतनी बड़ी घटना है कि आदमी बहुत झिझक कर ही वहां पैर रख सकता है। जब मैं ज्योतिष के संबंध में कुछ कह रहा हूं तो मेरा प्रयोजन है कि मैं उस पूरे-पूरे विज्ञान को आपको बहुत तरफ से उसके दर्शन करा दूं उस महल के। तो फिर आप भीतर बहुत आश्वस्त होकर प्रवेश कर सकें। और मैं जब ज्योतिष की बात कर रहा हूं तो ज्योतिषी की बात नहीं कर रहा हूं। उतनी छोटी बात नहीं है। पर आदमी की उत्सुकता उसी में है कि उसे पता चल जाए कि उसकी लड़की की शादी इस साल होगी कि नहीं होगी।

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मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 7


अगर एटम...एटम बहुत छोटी ताकत है। हमारे लिए बहुत बड़ी ताकत है। एक एटम एक लाख बीस हजार आदमियों को मार पाया हिरोशिमा और नागासाकी में। वह बहुत छोटी ताकत है। सूर्य के ऊपर जो ताकत है उसका हम इससे कोई हिसाब नहीं लगा सकते। जैसे अरबों एटम बम एक साथ फूट रहे हों! उतनी रेडियो एक्टिविटी सूरज के ऊपर है। और असाधारण है यह! क्योंकि सूरज चार अरब वर्षों से तो पृथ्वी को ही गर्मी दे रहा है, और उससे पहले से है। और अभी भी वैज्ञानिक कहते हैं कि कम से कम चार हजार वर्ष तक तो ठंडे होने की कोई संभावना नहीं है। प्रतिदिन इतनी गर्मी! और सूरज दस करोड़ मील दूर है पृथ्वी से। हिरोशिमा में जो घटना घटी उसका प्रभाव दस मील से ज्यादा दूर नहीं पड़ सका। दस करोड़ मील दूर सूरज है, चार अरब वर्षों से तो वह हमें सारी गर्मी दे रहा है, फिर भी अभी रिक्त नहीं हुआ है। पर यह सूरज कुछ भी नहीं है, इससे महासूर्य हैं, ये सब तारे हैं जो आकाश के। और इन प्रत्येक तारों से अपनी व्यक्तिगत और निजी क्षमता की सक्रियता हम तक प्रवाहित होती है।

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 6


इस संबंध में बहुत काम लारेंज नाम के एक वैज्ञानिक ने किया है और उसका कहना है कि वह जो फर्स्ट मोमेंट एक्सपोजर है, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। वह मां से इसीलिए संबंधित हो जाता है--मां होने की वजह से नहीं, फर्स्ट एक्सपोजर की वजह से। इसलिए नहीं कि वह मां है इसलिए उसके पीछे दौड़ता है; इसलिए कि वही सबसे पहले उसको उपलब्ध होती है इसलिए पीछे दौड़ता है।
अभी इस पर और काम चला है। जिन बच्चों को मां के पास बड़ा न किया जाए वे किसी स्त्री को जीवन में कभी प्रेम करने में समर्थ नहीं हो पाते--एक्सपोजर ही नहीं हो पाता। अगर एक बच्चे को उसकी मां के पास बड़ा न किया जाए तो स्त्री का जो प्रतिबिंब उसके मन में बनना चाहिए वह बनता ही नहीं। और अगर पश्चिम में आज होमोसेक्सुअलिटी बढ़ती हुई है तो उसके एक बुनियादी कारणों में वह कारण है। हेट्रोसेक्सुअल, विजातीय यौन के प्रति जो प्रेम है वह पश्चिम में कम होता चला जा रहा है। और सजातीय यौन के प्रति प्रेम बढ़ता चला जा रहा है, जो विकृति है। लेकिन वह विकृति होगी। क्योंकि दूसरे यौन के प्रति जो प्रेम है--पुरुष का स्त्री के प्रति और स्त्री का पुरुष के प्रति--वह बहुत सी शर्तों के साथ है। पहला तो एक्सपोजर जरूरी है। बच्चा पैदा हुआ है तो उसके मन पर क्या एक्सपोज हो

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 5


आप रेडियो लगाते हैं और आवाज सुनाई पड़नी शुरू हो जाती है। क्या आप सोचते हैं, जब रेडियो लगाते हैं तब आवाज आनी शुरू होती है?
आवाज तो पूरे समय बहती ही रहती है, आप रेडियो लगाएं या न लगाएं। लगाते हैं तब रेडियो पकड़ लेता है, बहती तो पूरे वक्त रहती है। दुनिया में जितने रेडियो स्टेशन हैं, सबकी आवाजें अभी इस कमरे से गुजर रही हैं। आप रेडियो लगाएंगे तो पकड़ लेंगे। आप रेडियो नहीं लगाते हैं तब भी गुजर रही हैं, लेकिन आपको सुनाई नहीं पड? रही हैं। आपको सुनाई नहीं पड़ रही हैं।
जगत में न मालूम कितनी ध्वनियां हैं जो चारों तरफ हमारे गुजर रही हैं। भयंकर कोलाहल है। वह पूरा कोलाहल हमें सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते ही हैं। ध्यान रहे, वह हमें सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते ही हैं। वह हमारे रोएं-रोएं को स्पर्श करता है। हमारे हृदय की धड़कन-धड़कन को छूता है। हमारे स्नायु-स्नायु को कंपा जाता है। वह अपना काम तो कर ही रहा है। उसका काम तो जारी है। जिस सुगंध को आप नहीं सूंघ पाते उसके अणु भी आपके चारों तरफ अपना काम तो कर ही जाते हैं। और अगर उसके अणु किसी बीमारी को लाए हैं तो वे आपको दे जाते हैं। आपकी जानकारी आवश्यक नहीं है किसी वस्तु के होने के लिए।

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 4

पैंतालीस वर्ष जब सूरज जवान होता है, उस वक्त जो बच्चे पैदा होते हैं उनका स्वास्थ्य अदभुत रूप से अच्छा होगा। और जब पैंतालीस वर्ष सूरज बूढ़ा होता है, उस वक्त जो बच्चे पैदा होंगे उनका स्वास्थ्य कभी भी अच्छा नहीं हो पाता। जब सूरज खुद ही ढलाव पर होता है तब जो बच्चे पैदा होते हैं उनकी हालत ठीक वैसी है जैसे पूरब को नाव ले जानी हो और पश्चिम को हवा बहती हो। तो फिर बहुत डांड चलाने पड़ते हैं, फिर पतवार बहुत चलानी पड़ती है और पाल काम नहीं करते। फिर पाल खोल कर नाव नहीं ले जाई जा सकती, क्योंकि उलटे बहना पड़ता है। जब सूरज ही बूढ़ा होता है, सूरज जो कि प्राण है सारे सौर परिवार का, तब जिसको भी जवान होना है उसे उलटी धारा में तैरना पड़ता है--हवा के खिलाफ। उसके लिए संघर्ष भारी है। जब सूरज ही जवान हो रहा होता है तो पूरा सौर परिवार शक्तियों से भरा होता है और उठान की तरफ होता है। तब जो पैदा होता है, वह जैसे पाल वाली नाव में बैठ गया। पूरब की तरफ हवाएं बह रही हैं, उसे डांड भी नहीं चलानी है, पतवार भी नहीं चलानी है, श्रम भी नहीं करना है, नाव खुद बह जाएगी। पाल खोल देना है, हवाएं नाव को ले जाएंगी।
इस संबंध में अब वैज्ञानिकों को भी शक होने लगा है कि सूरज जब अपनी चरम अवस्था में जाता है तब पृथ्वी पर कम से कम बीमारियां होती हैं। और जब सूरज अपने उतार पर होता है तब पृथ्वी पर सर्वाधिक बीमारियां होती हैं। पृथ्वी पर पैंतालीस साल बीमारियों के होते हैं और पैंतालीस साल कम बीमारियों के होते हैं।

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 3


इतने संवेदनशील हैं और सूरज पर होती हुई कोई भी घटना को इतनी व्यवस्था से अंकित करते हैं, तो क्या आदमी के चित्त में भी कोई पर्त होगी, क्या आदमी के शरीर में भी कोई संवेदना का सूक्ष्म रूप होगा, क्या आदमी भी कोई रिंग और वर्तुल निर्मित करता होगा अपने व्यक्तित्व में?
अब तक साफ नहीं हो सका। अभी तक वैज्ञानिकों को साफ नहीं है कोई बात कि आदमी के भीतर क्या होता है। लेकिन यह असंभव मालूम पड़ता है कि जब वृक्ष भी सूर्य पर घटती घटनाओं को संवेदित करते हों तो आदमी किसी भांति संवेदित करता

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 2


सूर्य और पृथ्वी के बीच ऐसा ही कम्युनिकेशन है, ऐसा ही संवाद है प्रतिपल। और पृथ्वी और मनुष्य के बीच भी इसी तरह का संवाद है प्रतिपल। तो सूर्य, पृथ्वी और मनुष्य, उन तीनों के बीच निरंतर संवाद है, एक निरंतर डायलाग है। लेकिन वह जो संवाद है, डायलाग है, वह बहुत गुह्य है और बहुत आंतरिक है और बहुत सूक्ष्म है। उसके संबंध में थोड़ी सी बातें समझेंगे तो खयाल में आएगा। अमरीका में एक रिसर्च सेंटर है--ट्री रिंग रिसर्च सेंटर। वृक्षों में जो, वृक्ष आप काटें तो वृक्ष के तने में आपको बहुत से रिंग्स, बहुत से वर्तुल दिखाई पड़ेंगे। फर्नीचर पर जो सौंदर्य मालूम पड़ता है वह उन्हीं वर्तुलों के कारण है। पचास वर्ष से यह रिसर्च केंद्र, वृक्षों में जो वर्तुल बनते हैं उन पर काम कर रहा है। तो प्रोफेसर डगलस अब उसके डायरेक्टर हैं, जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा, वृक्षों में जो वर्तुल बनते हैं, चक्र बन जाते हैं, उन पर ही पूरा व्यय किया है।

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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म भाग - 1




संबंध में कुछ बातें जान लेनी जरूरी हैं। सबसे पहली तो यह बात जान लेनी जरूरी है कि वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य से समस्त सौर परिवार का--मंगल का, बृहस्पति का, चंद्र का, पृथ्वी का जन्म हुआ है। ये सब सूर्य के ही अंग हैं। फिर पृथ्वी पर जीवन का जन्म हुआ--पौधों से लेकर मनुष्य तक। मनुष्य पृथ्वी का अंग है, पृथ्वी सूरज का अंग है। अगर हम इसे ऐसा समझें--एक मां है, उसकी एक बेटी है और उसकी एक बेटी है।

उन
तीनों के शरीर में एक ही रक्त प्रवाहित होता है, उन तीनों के शरीर का निर्माण एक ही तरह के सेल्स से, एक ही तरह के कोष्ठों से होता है।
और वैज्ञानिक एक शब्द का प्रयोग करते हैं एम्पैथी का। जो चीजें एक से ही पैदा होती हैं उनके भीतर एक अंतर-समानुभूति होती है। सूर्य से पृथ्वी पैदा होती है, पृथ्वी से हम सबके शरीर निर्मित होते हैं। थोड़ा ही दूर फासले पर सूरज हमारा महापिता है। सूर्य पर जो भी घटित होता है

वह
हमारे रोम-रोम में स्पंदित होता है। होगा ही। क्योंकि हमारा रोम-रोम भी सूर्य से ही निर्मित है। सूर्य इतना दूर दिखाई पड़ता है, इतना दूर नहीं है। हमारे रक्त के एक-एक कण में और हड्डी के एक-एक टुकड़े में सूर्य के ही अणुओं का वास है। हम सूर्य के ही टुकड़े हैं


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सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

ध्यान का ही दूसरा नाम


, और उसका डरना स्पष्ट और तर्कपूर्ण प्रतीत होता है। इसका सार क्या है? ऐसा कुछ क्यों करना चाहिए जिसमें वह मिट जाए? गौतम बुद्ध से बार-बार पूछा जाता था: ‘आप बहुत अजीब व्यक्ति हैं। हम तो यहां अपने आत्म अनुभव के लिए आए थे और आपका ध्यान ‘आत्मा का’ अनुभव न कराना है।’ सुकरात एक महान प्रज्ञावान पुरुष था , लेकिन वह मन तक सीमित था: ‘स्वयं को जानो’। लेकिन जानने के लिए कोई ' स्वयं ' है ही नहीं । झेन की घोषणा है कि ' जानने को आत्मा जैसा कुछ है ही नहीं।’ जानने जैसा कुछ भी नहीं है। तुम्हें बस पूर्ण के साथ एक हो जाना है। और भयभीत होने की कोई आवश्यकता ही नहीं है... जरा क्षण भर के लिए सोचो: जब तुम्हारा जन्म नहीं हुआ था, क्या कोई व्यग्रता, कोई चिंता या कोई पीड़ा थी? तुम थे ही नहीं, तो कोई समस्या भी न थी। समस्या तो तुम स्वयं ही हो, तुमसे ही समस्या शुरू होती हैं , और ज्यों -ज्यों तुम बडे होते हो, अधिक से अधिक समस्याएं बढ़ जाती हैं...लेकिन तुम्हारे जन्म से पूर्व, क्या कोई समस्या थी? झेन सदगुरु नवागतों से निरंतर पूछते थे--‘ तुम अपने पिता के जन्म के पूर्व कहां थे?

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स्वयं में डूबो


एक राजा ने किसी सामान्यत: स्वस्थ और संतुलित व्यक्ति को कैद कर लिया था- एकाकीपन का मनुष्य पर क्या प्रभाव होता है, इस अध्ययन के लिए। वह व्यक्ति कुछ समय तक चीखता रहा चिल्लाता रहा। बाहर जाने के लिए रोता था, सिर पटकता था- उसकी सारी सत्ता जो बाहर थी। सारा जीवन तो 'पर' से अन्य बंधा था। अपने में तो वह कुछ भी नहीं था। अकेला होना न होने के ही बराबर था। वह धीरे-धीरे टूटने लगा। उसके भीतर कुछ विलीन होने लगा, चुप्पी आ गई। रुदन भी चला गया। आंसू भी सूख गये और आंखें ऐसे देखने लगीं, जैसे पत्थर हों। वह देखता हुआ भी लगता जैसे नहीं देख रहा है। दिन बीते, वर्ष बीत गया। उसकी सुख सुविधा की सब व्यवस्था थी। जो उसे बाहर उपलब्ध नहीं था, वह सब कैद में उपलब्ध था। शाही आतिथ्य जो था! लेकिन वर्ष पूरे होने पर विशेषज्ञों ने कहा, 'वह पागल हो गया है।'

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शिक्षक में विद्रोह की ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए


मेरी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति ठीक अर्थों में शिक्षक तभी हो सकता है जब उसमें विद्रोह की एक अत्यंत ज्वलंत अग्नि हो। जिस शिक्षक के भीतर विद्रोह की अग्नि नहीं है वह केवल किसी न किसी निहित, स्वार्थ का, चाहे समाज, चाहे धर्म, चाहे राजनीति, उसका एजेंट होगा। शिक्षक के भीतर एक ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए विद्रोह की, चिंतन की, सोचने की। लेकिन क्या हममें सोचने की अग्नि है और अगर नहीं है तो आप भी एक दुकानदार हैं। शिक्षक होना बड़ी और बात है। शिक्षक होने का मतलब क्या है? क्या हम सोचते हैं-आप बच्चों को सिखाते होंगे, सारी दुनिया में सिखाया जाता है बच्चों को, बच्चों को सिखाया जाता है, प्रेम करो! लेकिन कभी आपने विचार किया है कि आपकी पूरी शिक्षा की व्यवस्था प्रेम पर नहीं, प्रतियोगिता पर आधारित है। किताब में सिखाते हैं प्रेम करो और आप की पूरी व्यवस्था, पूरा इंतजाम प्रतियोगिता का है।

जहां प्रतियोगिता है वहां प्रेम कैसे हो सकता है। जहां काम्पिटीशन है, प्रतिस्पर्धा है...


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स्वयं को जाने बिना ज्ञान नहीं


ज्ञान के लिए पिपासा है। कितनी प्यास है? प्रत्येक में देखता हूं। कुछ भीतर प्रज्ज्वलित है, जो शांत होना चाहता है और मनुष्य कितनी दिशाओं में खोजता है। शायद अनंत जन्मों से उसकी यह खोज चली आ रही है। पर हर चरण पर निराशा के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं आता है। कोई रास्ता पहुंचता हुआ नहीं दिखता है। क्या रास्ते कहीं भी नहीं ले जाते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना है। जीवन स्वयं इसका उत्तर है। क्या अनंत मार्गो और दिशाओं में चलकर उत्तर नहीं मिल गया है?
बौद्धिक उत्तर खोजने में, उसके धुएं में, वास्तविक उत्तर खो जाता है। बुद्धि चुप हो तो अनुभूति बोलती है। विचार मौन हों तो विवेक जाग्रत होता है।


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अकेले आए हैं, और हम अकेले जाएंगे


सदियों से यह बार-बार कहा जाता है। सारे धार्मिक लोग यह कहते रहे हैं: "हम इस जगत में अकेले आए हैं, और हम अकेले जाएंगे।' सारा साथ होना माया है। साथ होने का विचार ही इस कारण आता है क्योंकि हम अकेले हैं, और अकेलापन तकलीफ देता है। हम अपने अकेलेपन को रिश्ते में डुबो देना चाहते हैं...इसी कारण हम प्रेम में इतना उलझ जाते हैं। इस बिंदु को देखने की कोशिश करो। सामान्यतया तुम सोचते हो कि तुम पुरुष या स्त्री के प्रेम में पड़ गए क्योंकि वह सुंदर है। यह सत्य नहीं है। सत्य इसके ठीक विपरीत है: तुम प्रेम में पड़े क्योंकि तुम अकेले नहीं रह सकते। तुम्हें गिरना ही पड़ेगा। तुम अपने को इस या उस तरह से टालने ही वाले थे। और यहां ऐसे लोग हैं जो स्त्री या पुरुष के प्रेम में नहीं पड़ते--तब वे धन के प्रेम में पड़ते हैं। वे धन की तरफ या शक्ति की तरफ जाने लगते हैं, वे राजनेता बन जाते हैं। वह भी तुम्हारे अकेलेपन को टालना है। यदि तुम मनुष्य को देखो, यदि तुम स्वयं को गहराई से देखो, तुम आश्चर्यचकित होओगे--तुम्हारी सारी गतिविधियों को एक अकेले स्रोत में सिकोड़ा जा सकता है। स्रोत यह है कि तुम अपने अकेलेपन से डरते हो। बाकी सारी बातें तो बहाने मात्र हैं। वास्तविक कारण यह है कि तुम अपने को बहुत अधिक अकेला पाते हो।

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जो है वह मिट नहीं सकता


परमात्मा पर एक छलांग और लगानी पड़ेगी, वहां तर्क सारा तोड़ देना पड़ेगा। परमात्मा यानी अस्तित्व, जो है। सिर्फ है। इज़नेस, होना जिसका गुण है। हम कुछ भी करें, उसके होने में कोई अंतर नहीं पड़ता। इसे वैज्ञानिक किसी और ढंग से कहते हैं। वे कहते हैं, हम किसी चीज को नष्ट नहीं कर सकते। इसका मतलब हुआ कि हम किसी चीज को है-पन के बाहर नहीं निकाल सकते। अगर हम एक कोयले के टुकड़े को मिटाना चाहें, तो हम राख बना लेंगे। लेकिन राख रहेगी। हम उसे चाहे सागर में फेंक दें-वह पानी में घुलकर डूब जाएगी, दिखाई नहीं पड़ेगी, लेकिन रहेगी। हम सब कुछ मिटा सकते हैं, लेकिन उसकी इज़नेस, उसके होने को नहीं मिटा सकते। उसका होना कायम रहेगा। हम कुछ भी करते चले जाएं, उसके होने में कोई अंतर नहीं पड़ेगा। होना बाकी रहेगा। हां, होने को हम शकल दे सकते हैं। हम हजार शकलें दे सकते हैं। हम नए-नए रूप और आकार दे सकते हैं। हम आकार बदल सकते हैं, लेकिन जो है उसके भीतर, उसे हम नहीं बदल सकते। वह रहेगा।


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रविवार, 24 अक्तूबर 2010

अतीत या भविष्य



अतीत जा चुका और भविष्य अभी आया नहीं : दोनों ही दिशाओं को अस्तित्व नहीं है उधर जाना बेवहज है। कभी एक दिशा होती थी, लेकिन अब नहीं है, और एक अभी होना शुरू भी नहीं हुई है। सही व्यक्ति सिर्फ वही है जो क्षण-क्षण जीता है, जिसका तीर क्षण की तरफ होता है, जो हमेशा अभी और यहां है; जहां कहीं वह है, उसकी संपूर्ण चेतना, उसका पूर्ण होना, यहां के यथार्थ और अभी के यथार्थ में होता है। यही एकमात्र सही दिशा है। सिर्फ ऐसा ही व्यक्ति स्वर्ण द्वार में प्रवेश कर सकता है। वर्तमान ही वह स्वर्ण द्वार है। यहां-अभी स्वर्ण द्वार है...और तुम तभी वर्तमान में हो सकते हो जब तुम महत्वाकांक्षी नहीं हो--कुछ पाने की इच्छा नहीं रखत: शक्ति, धन, सम्मान, बुद्धत्व तक भी को पाने की कोई चाह नहीं क्योंकि सभी महत्वाकांक्षाएं तुम्हें भविष्य में ले जाती हैं। सिर्फ गैर-महत्वाकांक्षी व्यक्ति वर्तमान में हो सकता है। जो व्यक्ति वर्तमान में होना चाहता है उसे सोचना नहीं चाहिए, वह सिर्फ द्वार को देखे और प्रवेश कर जाए। अनुभव होगा, परंतु अनुभव के....


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एक नई धार्मिकता की शुरुआत


पढ़े क्लिक करे क्लिक भांति कार्य करता है। वह तुम्हारा हाथ पकड कर तुम्हें ठीक मार्ग पर ले जाता है। तुम्हारी आंखें खोलने में तुम्हारी सहायता करता है, और वह तुम्हें मन के पार जाने में सहायता देता है। तभी तुम्हारी तीसरी आंख खुलती है, तब तुम अपने अंदर देखना शुरू करते हो। एक बार तुम अपने अंदर देखने लगते हो, फिर सदगुरु का कार्य समाप्त हो जाता है। अब यह तुम पर ही निर्भर करता है।

तुम अपने मन और अमन के छोटे से अंतराल को एक क्षण में अत्यंत तीव्रता से और शीघ्रता से लांघ सकते हो। या आगे तुम बहुत धीमे-धीमे, झिझकते और रुकते हुए यात्रा कर सकते हो, इस बात से डरते हुए कि तुम अपने मन पर और अपनी निजता पर अपनी पकड खोते जा रहे हो, और कि सभी सीमाएं खोती जा रही हैं। तुम क्या कर रहे हो? तुम क्षण भर के लिए यह सोच सकते हो कि इससे सब कुच समाप्त हो सकता है या तुम फिर मन में वापस लौटने में समर्थ हो सकोगे। और कौन जानता है कि आगे क्या होने जा रहा है? सब कुछ विलुप्त होते जा रहा है

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सत्य को आधा नहीं किया जा सकता


शक्ति हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है, न में भी खो सकती है। इसलिए योग मानता है, सृष्टि सिर्फ एक पहलू है, प्रलय दूसरा पहलू है। ऐसा नहीं है कि सब कुछ सदा रहेगा; खोएगा, शून्य भी हो जाएगा। फिर-फिर होता रहेगा, खोता रहेगा। जैसे एक बीज को तोड़ कर देखें, तो कहीं किसी वृक्ष का कोई पता नहीं चलता। कितना ही खोजें, वृक्ष की कहीं कोई खबर नहीं मिलती। लेकिन फिर इस छोटे से बीज से वृक्ष आता जरूर है। कभी हमने नहीं सोचा कि बीज में जो कभी भी नहीं मिलता है, वह कहां से आता है? और इतने छोटे से बीज में इतने बड़े वृक्ष का छिपा होना?

फिर वह वृक्ष बीजों को जन्म देकर फिर खो जाता है। ठीक ऐसे ही पूरा अस्तित्व बनता है, खोता है। शक्ति अस्तित्व में आती है और अनस्तित्व में चली जाती है।


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राजनीतिज्ञ भी यह समझ गया है,


शिक्षक ज्ञान का प्रसारक नहीं है। जैसे उसकी स्थिति है वह उस ज्ञान का स्थापित, स्थायी रखने वाला है। जो उत्पन्न हो चुका है, और जो हो सकता है उसमें बाधा देने वाला है। वह हमेशा अतीत के घेरे से बाहर नहीं उठने देना चाहता है। और इसका परिणाम यह होता है कि हजार-हजार साल तक न मालूम किस-किस प्रकार की नासमझियां, न मालूम किस-किस तरह के अज्ञान चलते चले जाते हैं। उनको मरने नहीं दिया जाता, उनको मरने का मौका नहीं दिया जाता। राजनीतिज्ञ भी यह समझ गया है, इसलिए शिक्षक का शोषण राजनीतिज्ञ भी करता है। और सबसे आश्चर्य की बात है कि इसका शिक्षक को कोई बोध नहीं है कि उसका शोषण होता है सेवा के नाम पर, कि वह समाज की सेवा करता है, उसका शोषण होता है-इसका शिक्षक को कोई बोध नहीं है! किस-किस तरह का शोषण होता है?



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आकाश कभी नहीं बदलता


इसे एक दिशा से और समझने की कोशिश करें।
सागर हमारे अनुभव में-दिखाई पड़ने वाले अनुभव में, आंखों, इंद्रियों के जगत में-घटता-बढ़ता मालूम नहीं पड़ता। घटता-बढ़ता है। बहुत बड़ा है। अनंत नहीं, विराट है। नदियां गिरती रहती हैं सागर में, बाहर नहीं आतीं। आकाश से बादल पानी को भरते रहते हैं, उलीचते रहते हैं सागर को। कमी नहीं आती, अभाव नहीं हो जाता। फिर भी घटता है। विराट है-अनंत नहीं है, असीम नहीं है। विराट है सागर, इतनी नदियां गिरती हैं, कोई इंचभर फर्क मालूम नहीं पड़ता। ब्रह्मपुत्र, और गंगाएं, और ह्वांगहो, और अमेजान, कितना पानी डालती रहती हैं प्रतिपल! सागर वैसा का वैसा रहता है। हर रोज सूरज उलीचता रहता है किरणों से पानी को। आकाश में जितने बादल भर जाते हैं, वे सब सागर से आते हैं। फिर भी सागर जैसा था वैसा रहता है। फिर भी मैं कहता हूं कि सागर का अनुभव सच में ही घटने-बढ़ने का नहीं है। घटता-बढ़ता है, लेकिन इतना बड़ा है कि हमें पता नहीं चलता।

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हमारे भीतर एक ही अस्तित्व है,


योग का कहना है कि हमारे भीतर शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर चेतन और अचेतन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर एक ही अस्तित्व है, जिसके ये दो छोर हैं। और इसलिए किसी भी छोर से प्रभावित किया जा सकता है। तिब्बत में एक प्रयोग है, जिसका नाम हीट-योग है, उष्णता का योग। वह तिब्बत में सैकड़ों फकीर हैं ऐसे जो नंगे बर्फ पर बैठे रह सकते हैं और उनके शरीर से पसीना चूता रहता है। इस सबकी वैज्ञानिक जांच-परख हो चुकी है। इस सबकी डाक्टरी जांच-परख हो चुकी है। और चिकित्सक बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं कि यह क्या हो रहा है? एक आदमी बर्फ पर बैठा है नंगा, चारों तरफ बर्फ पड़ रही है, बर्फीली हवाएं बह रही हैं, और उसके शरीर पर पसीना बह रहा है! क्या हुआ है इसको? यह आदमी योग के सूत्र का प्रयोग कर रहा है। इसने मन से मानने से इनकार कर दिया कि बर्फ पड़ रही है। यह आंख बंद करके यह कह रहा है, बर्फ नहीं पड़ रही है। यह आंख बंद करके कह रहा है कि सूरज तपा है और धूप बरस रही है। और यह आदमी आंख बंद करके कह रहा है कि मैं गरमी से तड़पा जा रहा हूं। शरीर उसका अनुसरण कर रहा है, वह पसीना छोड़ रहा है।

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शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

नैतिकता का जाल


कनफ्यूशियस कुछ दिनों के लिए एक दफा मजिस्ट्रेट हो गया था। ज्यादा दिन नहीं रह सका। क्योंकि अच्छा आदमी मजिस्ट्रेट ज्यादा दिन नहीं रह सकता। मजिस्ट्रेट ज्यादा दिन वही रह सकता है जिसके पास कोई आत्मा न हो। कनफ्यूशियस मजिस्ट्रेट हो गया था, उसके पास आत्मा थी इसलिए पहले मुकदमे में ही सब गड़बड़ हो गई बात। दूसरा मुकदमा उसके सामने नहीं लाया जा सका, क्योंकि वह निकाल बाहर कर दिया गया।
मुकदमा आ गया था, एक साहूकार, जो उसके गांव का सबसे बड़ा साहूकार था, उसकी चोरी हो गई थी। कनफ्यूशियस के सामने मुकदमा आया। चोर पकड़ लिया गया था। चोरी में गई चीजें पकड़ ली गई थीं। मामला साफ था। सजा देनी चाहिए थी। कनफ्यूशियस ने सजा दी। लेकिन दोनों को सजा दे दी, साहूकार को भी और चोर को भी। छह-छह महीने की सजा दे दी।
साहूकार चिल्लाया कि मजाक करते हैं, किस कानून में लिखा है यह? और यह क्या पागलपन है, मुझे सजा देते हैं? कनफ्यूशियस ने कहा: तुम न होते तो यह चोर भी नहीं हो सकता था। तुम हो इसलिए यह चोर है। चोर बाई-प्रोडक्ट है। चोर तुम्हारी पैदाइश है। यह तुम्हारा पुत्र है चोर। तुम बाप हो, यह बेटा है। तुमने सारे गांव की संपत्ति इकट्ठी कर ली, चोरी नहीं होगी तो क्या होगा? सारे गांव की संपत्ति इकट्ठी हो गई एक तरफ, सारा गांव कंगाल हो गया, चोरी नहीं होगी तो क्या होगा? इस चोर का कसूर ज्यादा नहीं है, पूरा गांव चोर हो जाएगा धीरे-धीरे।


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ओशो या महाविनाश


यदि आपसे कहा जाए कि ईसा मसीहवहाँ गए थे जहाँ ओशो का जन्म होनेवाला था तब शायद आप विश्वास नहींकरेंगे। लेकिन इस बात के सबूत हैं।आपसे यह कहा जाए कि ओशो केछुटपन से ही हरिप्रसाद चौरसियाउनके समक्ष बाँसुरी बजाते थे, तबशायद आप मान भी जाएँ। यह भी कि युवा ओशो को देखकर जवाहरलालनेहरु की आँखों में आँसू गए थे। क्या आप जानते है कि एक 10-12 साल का बच्चा महात्मा गाँधी के हाथ से दानपात्र छीनकर यह कहे कि इसकी जरूरत मेरे गाँव को ज्यादा है। क्या 14 साल का बालक भरी बारसात में सैकड़ों फुट गहरी और उफनती नर्मदा में कूदकर मिलों पार जा सकता है? जिन्होंने नर्मदा का उफान देखा है, वे जानते हैं कि इसमें सिर्फ वही कूदता है, जिसने मरने की ठान ली हो।

स्कूल में दाखिल होते समय उन्होंने अपने पिता से कहा था कि इस जेल में भर्ती कर रहे हैं आप मुझे? मैं 'नहीं' भर्ती होना चाहता। नहीं। लेकिन उन्हें घसीटकर स्कूल में ले जाया गया। स्कूल में दाखिल हुए तो 'काना मास्टर' को पहले ही दिन स्कूल छोड़ना पड़ा। वह मास्टर जो बच्चों को बेहद निर्मम तरीके से मारकर पढ़ाता था।

ओशो जब सागर युनिवर्सिटी से बाहर हो रहे थे तब उनके प्रोफेसर ने कहा था कि इस युनिवर्सिटी को छोड़कर मत जाओ, तुम्हारे जैसे होनहार की जरूरत है। अभी तुम्हें पीएचडी करना है। ओशो ने कहा था- माफ करना 'नहीं' बहुत रह लिया इन जेलों में। दोनों ही वक्त वे बड़े से दरवाजे पर खड़े थे। आमतौर पर पहले स्कूल और कॉलेजों के बड़े से दरवाजे जेल जैसे हुआ करते थे।


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सुख और दुख एक ही अनुभव के नाम


मनुष्य के अनुभव में, प्रतीति में सुख और दुख दो अनुभूतियां हैं-गहरी से गहरी। अस्तित्व का जो अनुभव है, अगर हम नाम को छोड़ दें, तो या तो सुख की भांति होता है या दुख की भांति होता है। और सुख और दुख भी दो चीजें नहीं हैं। अगर हम नाम बिलकुल छोड़ दें, तो सुख दुख का हिस्सा मालूम होगा और दुख सुख का हिस्सा मालूम होगा। लेकिन हम हर चीज को नाम देकर चलते हैं। मेरे भीतर सुख की प्रतीति हो रही हो, अगर मैं यह न कहूं कि यह सुख है, तो हर सुख की प्रतीति की अपनी पीड़ा होती है। यह थोड़ा कठिन होगा समझना। हर सुख की प्रतीति की अपनी पीड़ा होती है। प्रेम की भी अपनी पीड़ा है। सुख का भी अपना दंश है, सुख की भी अपनी चुभन है, सुख का भी अपना कांटा है-अगर नाम न दें। अगर नाम दे दें, तो हम सुख को अलग कर लेते हैं, दुख को अलग कर देते हैं। फिर सुख में जो दुख होता है, उसे भुला देते हैं-मान कर कि वह सुख का हिस्सा नहीं है। और दुख में जो सुख होता है, उसे भुला देते हैं-मान कर कि वह दुख का हिस्सा नहीं है। क्योंकि हमारे शब्द में दुख में सुख कहीं भी नहीं समाता; और हमारे शब्द सुख में दुख कहीं भी नहीं समाता।

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बच्चे अपने मां-बाप से आगे जाएँ


दुनिया में भौतिक समृद्धि बढ़ती है, क्योंकि भौतिक समृद्धि को हम जहां हमारे मां-बाप छोड़ते हैं, उससे आगे ले जाते हैं। लेकिन मानसिक समृद्धि नहीं बढ़ती है क्योंकि मानसिक समृद्धि में हम अपने मां-बाप से आगे जाने को तैयार नहीं। आपके पिता जो मकान बना गए थे, लड़का उसको दो मंजला बनाने में संकोच अनुभव नहीं करता, बल्कि खुश होता है। बल्कि बाप भी खुश होगा कि मेरे लड़के ने मेरे मकान को दो मंजिल किया, तीन मंजल किया। लेकिन महावीर, बुद्ध, राम और कृष्ण जो वसीयत छोड़ गए हैं उनके मानने वाले इस बात से बहुत मुश्किल में पड़ जाएंगे कि किसी व्यक्ति ने गीता के आगे विचार किया, कि गीता के एक मंजिले झोपड़े को दो मंजिल का मकान बनाया है। नहीं, मन के तल पर जो मकान बाप छोड़ गए हैं उसके भीतर ही रहना जरूरी है, उससे बड़ा मकान नहीं बनाया जा सकता है। और इस बात की हजारों साल से चेष्टा चलती है कि कोई बच्चा बाप के आगे न निकल जाए।

इसकी कई तरकीबें हैं, कई व्यवस्थाएं हैं। इसीलिए दुनिया में समृद्धि बढ़ती है-भौतिक, लेकिन मानसिक दीनता बढ़ती चली जाती है। और जब मन छोटा हो और भौतिक समृद्धि ज्यादा हो तो खतरे पैदा हो जाते हैं। जिस भांति हम भौतिक जगत में अपने मां-बाप से आगे बढ़ते हैं, जरूरी है कि बच्चे मानसिक और आध्यात्मिक विकास में भी अपने मां-बाप को पीछे छोड़ दें। इसमें मां-बाप का अपमान नहीं, बल्कि इसी में सम्मान है। ठीक-ठीक पिता वही है, ठीक-ठीक पिता का प्रेम वही है कि वह चाहे कि उसका बच्चा हर दृष्टि से उसे पीछे छोड़ दे।...हर दृष्टि से उसे पीछे छोड़ दे!



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स्वयं को समझे बिना ओशो को नहीं समझा जा सकता


यदि आप स्वयं को समझते हैं, तो ही ओशो को समझ सकते हैं । ओशो किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, ओशो संपूर्ण अस्तित्व की अभिव्यक्ति हैं । ओशो शाश्वत हैं, ओशो ने किसी बंधी-बंधाई और किसी संकीर्ण विचारधारा को कभी अभिव्यक्त नहीं किया । जब आप कहते हैं कि भारतीय संस्कृति ,तो आपने स्वयं को अस्तित्व से अलग कर लिया, अस्तित्व में कोई रेखाएँ नहीं हैं, जहाँ मनुष्य को भारतीय या पाकिस्तानी के बीच बाँटा जा सके । जब आप भारतीय संस्कृति को श्रेष्ठ कहते हैं, तो आप में अन्य संस्कृतियों के प्रति वैर भाव आ ही गया । आप ने स्वयं का मंडन और दूसरे का खंडन कर ही दिया । लेकिन अस्तित्व में कहीं कोई दूसरा है ही नहीं, सबका अस्तित्व अद्वितीय है । इसके लिए स्वयं की समझ और अस्तित्व का गहन स्वीकार भाव चाहिए ।
ओशो ने कभी नहीं कहा कि उनके अनुसार जीवन बनाया जाए । जीवन तो अस्तित्व की एक अनुपम भेंट हैं । हम सबमें वह खिलता है ।अस्तित्व किसी दमन को नहीं जानता । वह तो बस होना है । लेकिन मनुष्य अपने होने के अलावा कुछ और बनने की कोशिश करता है । इस और बनने में ही दुख है । ओशो स्वयं को जीते हैं, वे किसी दूसरे जैसे होने की कोशिश नहीं करते । यही उनका सौंदर्य है और यही उनकी सीखावन है, कि व्यक्ति-व्यक्ति स्वयं की तरह जिए । अस्तित्व ने जो अद्वितीयता उसमें दी है , उसका सम्मान करे । अस्तित्व कभी कार्बन का़पी नहीं बनाता

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शिक्षक, समाज और क्राँति





शिक्षक और समाज के संबंध में कुछ थोड़ी सी बातें जो मुझे दिखाई पड़ती हैं, वह मैं आपसे कहूं। शायद जिस भांति आप सोचते रहे होंगे उससे मेरी बात का कोई मेल न हो। यह भी हो सकता है कि शिक्षाशास्त्री जिस तरह की बातें कहता है उस तरह की बातों से मेरा विरोध भी हो। न तो मैं कोई शिक्षाशास्त्री हूं और न ही समाजशास्त्री। इसलिए सौभाग्य है थोड़ा कि मैं शिक्षा और समाज के संबंध में कुछ बुनियादी बातें कह सकता हूं। क्योंकि जो शास्त्र से बंध जाते हैं उनका चिंतन समाप्त हो जाता है। जो शिक्षाशास्त्री हैं उनसे शिक्षा के संबंध में कोई सत्य प्रकट होगा, इसकी संभावना अब करीब-करीब समाप्त मान लेनी चाहिए। क्योंकि पांच हजार वर्ष से वे चिंतन करते हैं लेकिन शिक्षा की जो स्थिति है, शिक्षा का जो ढांचा है, उस शिक्षा से पैदा होने वाले मनुष्यों की जो रूप-रेखा है वह इतनी गलत, इतनी अस्वस्थ और भ्राँत है कि यह स्वाभाविक है कि शिक्षाशास्त्रियों से निराशा पैदा हो जाए। समाजशास्त्री भी, जो समाज के संबंध में चिंतन करता है वह भी अत्यंत रुग्ण और अस्वस्थ है। अन्यथा मनुष्य-जाति, उसका जीवन, उसका विचार बहुत अलग और अन्यथा हो सकते थे। मैं दोनों में से कोई भी नहीं हूं इसलिए कुछ ऐसी बातें संभव हैं, आपसे कह सकूं जो सीधी समस्याओं को देखने से पैदा होती हैं

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प्रेम का अनुभव पूर्णता का अनुभव है




मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि हमारी सारी तकलीफ एक है, हमारा सारा तनाव, हमारी सारी एंग्जाइटी, हमारी सारी चिंता एक है; और वह चिंता इतनी है कि प्रेम कैसे मिले! और जब प्रेम नहीं मिलता तो हम सब्स्टीट्यूट खोजते हैं प्रेम के, हम फिर प्रेम के ही परिपूरक खोजते रहते हैं। लेकिन हम जिंदगीभर प्रेम खोज रहे हैं, मांग रहे हैं।

क्यों मांग रहे हैं? आशा से कि मिल जाएगा, तो बढ़ जाएगा। इसका मतलब फिर यह हुआ कि हमें फिर प्रेम का पता नहीं था। क्योंकि जो चीज मिलने से बढ़ जाए, वह प्रेम नहीं है। कितना ही प्रेम मिल जाए, उतना ही रहेगा जितना था।

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शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

कोई भी मेरे ऊपर निर्भर नहीं है


तुम चाहो भी निर्भर होना तो मैं तुम्हें होने नहीं दूंगा। तुम्हारी निर्भर होने की इच्छा के कारण ही तुमने संगठित धर्म पैदा किए हैं। तुम्हारी निर्भर होने की इच्छा के कारण ही तुम सब तरह के चर्चों, संप्रदायों और पंथों के गुलाम हो गए हो। मनोविश्लेष्कों के अनुसार यह फादर-फिक्सेशन है, पिता से बंध जाना है क्योंकि बच्चा अपने माता-पिता पर बहुत ज्यादा निर्भर होता है।

यदि वह लड़का है तो वह मां से बंध जाता है, और वह बहुत बड़ी समस्या है। यदि वह लड़की है तो वह पिता से बंध जाती है। हर लड़की उसके पूरे जीवन अपने पति में पिता जैसा व्यक्ति ढूंढती रहेगी-और यह असंभव है। कुछ भी दोहराया नहीं जाता। तुम अपने पिता को पति की तरह नहीं ढूंढ सकते। इसीलिए हर स्त्री हताश है, कोई पति सही नहीं लगता। हर पुरुष निराश है-क्योंकि कोई भी स्त्री तुम्हारी मां नहीं होगी।

अब, यह बड़ी अजीब समस्या है। पति अपनी पत्नी में मां को ढूंढने का प्रयास कर रहा है, पत्नी अपने पति में पिता को ढूंढने का प्रयास कर रही है। वहां सतत संघर्ष है। शादी नरक की आग है। चूंकि वे पति की तरह, पत्नी की तरह दुखी हैं, उन्हें कहीं सांत्वना ढूंढनी होगी-किसी परमात्मा में, किसी पंडित में।

तुम परमात्मा को पिता क्यों कहते हो? और फिर देवियों को मां कहते हैं...ये बचपन के बंधन हैं। तुम उन पर निर्भर थे। कब तक तुम अपने माता-पिता के साथ चिपके रहोगे? पिता और मां चाहते हैं कि तुम आत्मनिर्भर होओ लेकिन उन्हें होश नहीं है कि उन्होंने एक ही बात सिखाई है: निर्भर होओ।

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ओशी के कुछ फोटोस




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नीति और धर्म दो विपरीत दिशाएं


मैं नीति और धर्म की दिशाओं को भिन्न मानता हूं; भिन्न ही नहीं, विपरीत मानता हूंक्यों मानता हूं, उसे समझाना चाहता हूं। नीति-साधना का अर्थ है : आचरण-शुद्धि, व्यवहार-शुद्धि। वह व्यक्तित्व की परिधिको बदलने का प्रयास है। व्यक्तित्व की परिधि मेरा दूसरों से जो संबंध है, उससे निर्मित होती है। वह दूसरों से मेरा व्यवहार है। मैं दूसरों के साथ कैसा हूं, वही मेरा आचरण है। आचरण यानी संबंध, रिलेशन।

मैं अकेला नहीं हूं। मैं अपने चारों ओर अन्य लोगों से घिरा हूं। मैं समाज में हूं और इसलिए प्रतिक्षण किसी किसी से संबंधित हूं। यह अतर्संबंध ही जीवन मालूम होता है। मेरे संबंध शुभ हैं तो मेरा आचरण सद है, और मेरे संबंध अशुभ हैं तो मेरा आचरण असद है। सदाचरण की हमें शिक्षा दी जाती है। वह समाज के लिए आवश्यक है। वह एक सामाजिक आवश्यकता है।

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साक्षी:समस्त धर्म-अनुभव की एकमात्र वैज्ञानिक आधारशिला - अंतिम भाग


जब आपका ध्यान किसी पर जाए, रास्ते से गुजरी कोई सुंदर युवती, कोई सुंदर युवक--आपका ध्यान अटक गया। तब आप अपने को बिलकुल भूल गए। यहां भीतर ध्यान न रहा। अब आप होश में नहीं हैं। अब आप बेहोश हैं, क्योंकि आपका होश तो किसी और के पास चला गया। अब आपका होश तो उसकी छाया बन गया। अब आप होश में नहीं हैं।

अगर आप यह काम कर सकें कि कोई आपको सुंदर दिखाई पड़ा, ध्यान उस पर गया, उस समय इस पर भी भीतर ध्यान जाए जहां से प्रत्यंचा से तीर छूट रहा है; उसकी तरफ भी हम एक साथ ही अगर देख पाएं; जहां से ध्यान जा रहा है वह स्रोत और जिसकी तरफ ध्यान जा रहा है वह लक्ष्य, अगर दोनों हमारे ध्यान में एक साथ आ जाएं, तो आपको पहली दफा पता चलेगा कि साक्षी का क्या अर्थ है। कहां से ध्यान जा रहा है, उस स्रोत का अनुभव होना चाहिए--कहां से ध्यान पैदा हो रहा है!

वृक्ष हमें दिखाई पड़ता है; शाखाएं दिखाई पड़ती हैं; फूल-पत्ते दिखाई पड़ते हैं; फल लग जाते हैं वे दिखाई पड़ते हैं; जड़ें हमें नहीं दिखाई पड़तीं, जड़ें अंधेरे में छिपी हैं। लेकिन वहीं से वृक्ष रस ले रहा है।

आपका ध्यान फैलता है चारों तरफ, जगत का बड़ा वृक्ष निर्मित हो जाता है। लेकिन जहां से ध्यान निकलता है, जिस स्रोत से, जिस चैतन्य के सागर से निकलता है, उस तरफ का आपको कोई भी पता नहीं है। उन जड़ों का भी बोध साथ-साथ होने लगे, एक साथ आपको दोनों बात दिखाई पड़ने लगें...


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साक्षी:समस्त धर्म-अनुभव की एकमात्र वैज्ञानिक आधारशिला - भाग 2


जब कोई भी अनुभव नहीं होता, और कोई दर्शन नहीं होता, और कोई दिखाई नहीं पड़ता, और कोई विषय नहीं रह जाता, और जब साक्षी अकेला रह जाता है, तब कठिनाई है भाषा में कहने की कि क्या होता है। क्योंकि हमारे पास अनुभव के सिवाय कोई शब्द नहीं है। इसलिए इसे हम कहते हैं आत्म-अनुभव, लेकिन अनुभव शब्द ठीक नहीं है। हम कहते हैं चेतना का अनुभव या ब्रह्म-अनुभव। लेकिन यह शब्द, कोई भी शब्द ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव उसी दुनिया का शब्द है, जिसको हमने तोड़ डाला। अनुभव उस द्वैत की दुनिया में अर्थ रखता है जहां दूसरा भी था, यहां अब कोई अर्थ नहीं रखता। यहां सिर्फ अनुभोक्ता बचा, साक्षी बचा।

इस साक्षी की तलाश ही अध्यात्म है।

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